Raigarhछत्तीसगढ़

फोटो खिंचवाने नदी में उतरे मंत्री-अफसर, अगले ही दिन केलो नदी में खंडित प्रतिमाओं का अंबार, आस्था छलनी, क्या सिर्फ सोशल मीडिया की वाहवाही तक सीमित है ‘सेवा संकल्प अभियान’?

रायगढ़ / रायगढ़ की जीवनरेखा कही जाने वाली केलो नदी आज अपने आंसुओं से अपनी ही बदहाली की दास्तान बयां कर रही है। जिस नदी के पानी से इस शहर की सांसें चलती हैं, जिस नदी के आंचल को संवारने के लिए महज बहत्तर घंटे पहले सूबे के वित्त मंत्री और स्थानीय विधायक ओपी चौधरी लाव-लश्कर के साथ उतरे थे, आज उसी केलो के आंचल पर आस्था के टुकड़े-टुकड़े बिखरे पड़े हैं। विसर्जन के चौबीस घंटे के भीतर केलो के तटों का जो विभत्स और हृदयविदारक मंजर सामने आया है, उसने नगर निगम प्रशासन के दावों, नेताओं के स्वच्छता संकल्पों और सोशल मीडियाई विज्ञापनों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं।

गणेश विसर्जन के ठीक बाद नदी के किनारे प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की खंडित प्रतिमाएं लावारिस कचरे की तरह कीचड़ में सनी मिलीं। कहीं बप्पा का शीश अलग पड़ा दिखा, तो कहीं विघ्नहर्ता के हाथ टूटे हुए पत्थरों के बीच फंसे नजर आए। रिद्धि-सिद्धि की मूर्तियां किनारे पर अपमानित अवस्था में लावारिस छोड़ दी गईं। आस्था के इस खुले अनादर और मैया केलो के इस चीरहरण को देखकर हर उस शहरवासी का कलेजा फट पड़ा, जिसने कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर मंत्री जी और निगम अफसरों के ‘स्वच्छता ही सेवा’ वाले चमचमाते पोस्ट देखे थे।

सोशल मीडिया का चमकता पर्दा और ज़मीनी हकीकत का बदबूदार सच..अभी तीन दिन पहले ही वित्त मंत्री ओपी चौधरी के सोशल मीडिया हैंडल से एक बेहद लुभावनी और चमकदार पोस्ट जारी हुई थी—”सेवा संकल्प अभियान 2026: खर्राघाट”। उस पोस्ट में बड़े-बड़े वादे परोसे गए थे कि खर्राघाट में स्वच्छता अभियान चलाया गया, नदी तट से पॉलिथीन और अपशिष्ट हटाए गए, और रायगढ़ विधायक की पहल से 8.50 एकड़ में ऑक्सीजोन, पैदल पथ, घाट और पार्किंग विकसित कर शहर को हरा-भरा बनाया जाएगा। तस्वीरों में मंत्री जी खुद नदी में उतरकर झाड़ू और कचरा उठाते दिखे थे, पीछे नगर निगम के आला अफसरों की पूरी फौज कैमरे की ओर मुस्कुराते हुए स्वच्छता का संकल्प दोहरा रही थी।

डिजिटल दुनिया में खूब तालियां पिटीं, वाहवाही लूटी गई, और समर्थकों ने इसे ‘स्वच्छ, सुंदर और हरित रायगढ़ की ओर ऐतिहासिक कदम’ करार दे दिया। मगर सवाल यह उठता है कि क्या वह पसीना सिर्फ कैमरे के फ्लैश चमकाने के लिए बहाया गया था? क्या नगर निगम के अफसरों की जिम्मेदारी सिर्फ मंत्री जी के फ्रेम में सटकर खड़े होने और उनकी फेसबुक टाइमलाइन को सजाने तक ही सीमित है? अगर खर्राघाट और केलो तट को बचाने का संकल्प इतना ही मजबूत था, तो विसर्जन के अगले ही दिन वह संकल्प नदी के गंदे पानी में क्यों बह गया?

आस्था का सरेआम कत्ल: कीचड़ में कराहते प्रथम पूज्य, रिद्धि-सिद्धि का घोर अपमान..गणेशोत्सव के पावन पर्व पर शहरवासियों ने जिस देवाधिदेव को दस दिनों तक ढोल-नगाड़ों और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ पूजा, वही बप्पा विसर्जन के अगले दिन केलो नदी के उथले पानी और दलदल में बेकद्री के शिकार मिले। विसर्जन के नाम पर निगम प्रशासन ने जो व्यवस्थाएं की थीं, वे कागजी साबित हुईं। न तो विसर्जन के लिए बनाए गए कृत्रिम कुंडों का सही प्रबंधन हुआ और न ही नदी के मुख्य प्रवाह में प्रतिमाओं के सम्मानजनक विसर्जन की कोई सुध ली गई। नतीजा यह हुआ कि उथले पानी और पत्थरों पर पटक दिए जाने से दर्जनों प्रतिमाएं विसर्जन के दौरान ही खंडित हो गईं। विसर्जन के अगले दिन का दृश्य किसी भी संवेदनशील सनातनी के रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

नदी के किनारे झाड़ियों और पत्थरों के बीच भगवान गणेश की आधी-अधूरी, टूटी-फूटी मूर्तियां लावारिस पड़ी थीं। रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं गंदगी और सड़े हुए निर्माल्य के बीच तैर रही थीं। जिन हाथों को जोड़कर पूरा शहर सुख-समृद्धि मांगता है, वही हाथ तट पर रेत में दबे नजर आ रहे थे। आस्था का ऐसा वीभत्स माखौल शायद ही कभी देखा गया हो। यह दृश्य केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उन लाखों श्रद्धालुओं की गहरी आस्था पर तीखा तमाचा है, जिन्होंने शासन-प्रशासन के भरोसे अपनी पूज्य प्रतिमाओं को विसर्जित किया था।दिखावे की राजनीति और निगम की गहरी नींद: जनता कब तक सहेगी यह छलावा?जब जनप्रतिनिधि और अधिकारी सिर्फ लाइमलाइट बटोरने के आदी हो जाएं, तो व्यवस्थाएं इसी तरह दम तोड़ती हैं।

नगर निगम रायगढ़ की कार्यप्रणाली पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि निगम के साहबान केवल अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने और फोटोग्राफी सेशन आयोजित करने में व्यस्त हैं। विसर्जन जैसे संवेदनशील और वृहद आयोजन के लिए जिस पूर्व तैयारी की जरूरत थी, वह शून्य साबित हुई। विसर्जन के तुरंत बाद नदी से अवशिष्ट और सुरक्षित रूप से प्रतिमाओं के भू-विसर्जन या जल-प्रबंधन के लिए एनजीटी के कड़े दिशा-निर्देश हैं, लेकिन रायगढ़ नगर निगम ने इन नियमों को केलो के पानी में डुबो दिया। मंत्री जी के साथ फोटो खिंचवाते वक्त जो अफसर कर्तव्यनिष्ठा की मूरत बने घूम रहे थे, वे विसर्जन के दिन नदारद थे। नदी के घाटों पर न कोई व्यवस्थित निगरानी थी, न प्रतिमाओं के सम्मानजनक विसर्जन के लिए गोताखोरों या क्रेन की मुकम्मल तैनाती।

नतीजतन, लोगों ने जैसे-तैसे प्रतिमाओं को बहाया और वे किनारे पर ही अटक कर खंडित हो गईं। क्या इन एसी कमरों में बैठने वाले अफसरों को नदी के किनारे तड़पती आस्था की चीखें सुनाई नहीं देतीं?ऑक्सीजोन के बड़े-बड़े ख्वाब, मगर वेंटिलेटर पर पड़ी है केलो मैया..वित्त मंत्री जी 8.50 एकड़ में ऑक्सीजोन बनाने का सपना दिखा रहे हैं। वे पैदल पथ, खूबसूरत घाट और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के कसीदे पढ़ रहे हैं। विकास का यह खाका सुनने में बेहद सुकून देता है, मगर शहर की जनता यह पूछ रही है कि जिस नदी के अस्तित्व को आप खंडित प्रतिमाओं और सड़े हुए कचरे से नहीं बचा पा रहे, उस नदी के किनारे बनने वाला ऑक्सीजोन किस काम का? जब नदी का अपना दम घुट रहा हो, जब केलो मैया स्वयं इंसानी गंदगी और प्रशासनिक उपेक्षा के वेंटिलेटर पर पड़ी हो, तब उसके सीने पर पत्थरों के घाट और कंक्रीट का ऑक्सीजोन खड़ा करके आप किसे ताजी हवा देंगे? आस्था को दरकिनार कर केवल सीमेंट-कंक्रीट के प्रोजेक्ट्स को विकास बता देना ही क्या नया रायगढ़ मॉडल है? अगर सरकार सचमुच केलो के प्रति गंभीर है, तो मंत्री जी को अपने उन लापरवाह मातहतों से जवाब तलब करना चाहिए, जिन्होंने उनके तीन दिन पुराने ‘सेवा संकल्प’ को विसर्जन के कचरे में तब्दील कर दिया।झूठ की चमड़ी मोटी हो चुकी है, अब जवाबदेही तय करने का वक्त है..यह शहर अब सिर्फ वादों, प्रेस नोटों और सोशल मीडिया रील्स से बहलने वाला नहीं है।

रायगढ़ की जनता यह बर्दाश्त नहीं करेगी कि उनकी जीवनदायिनी केलो को सिर्फ नेताओं की ब्रांडिंग का जरिया बना दिया जाए और उनके आराध्य देव की मूर्तियों को इस तरह किनारे पर अपमानित होने के लिए छोड़ दिया जाए। यह साफ तौर पर आस्था और पर्यावरण दोनों के साथ किया गया अक्षम्य अपराध है। अगर वित्त मंत्री जी की मंशा सचमुच साफ है, तो उन्हें तुरंत उस खर्राघाट पर दोबारा जाना चाहिए, जहां उन्होंने झाड़ू उठाई थी, और देखना चाहिए कि उनकी बनाई रील के पीछे का सच कितना बदरंग है।

नगर निगम के उन अधिकारियों पर तत्काल कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने विसर्जन के नाम पर केवल खानापूर्ति की और भगवान गणेश की प्रतिमाओं को इस दुर्गति तक पहुंचने दिया। अगर जनप्रतिनिधि और अफसर केवल दिखावे के लिए नदी में उतरेंगे और अगले ही दिन मुंह फेर लेंगे, तो जनता यह समझने में देर नहीं लगाएगी कि स्वच्छता का यह ढोंग केवल अपनी राजनीतिक साख चमकाने का हथकंडा था। केलो मैया आज अपने बेटों से इंसाफ मांग रही है, और इस बेअदबी का जवाब रायगढ़ के हर उस जिम्मेदार को देना ही होगा, जिसकी चुप्पी ने आस्था को लहूलुहान किया है।

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