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सोशल मीडिया में सिमटता जा रहा इंसान, आध्यात्मिकता ही जीवन को दे सकती है दिशा : आचार्य इन्द्रेश महाराज

रायपुर/ रायपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में पत्रकारों से आध्यात्मिकता, युवा शक्ति, धर्म, राजनीति, मंदिर व्यवस्था और गोवंश संरक्षण सहित विभिन्न विषयों पर किया संवादरायपुर। रायपुर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथावाचक एवं आध्यात्मिक वक्ता आचार्य इन्द्रेश महाराज पत्रकारों से रूबरू हुए।

इस अवसर पर उन्होंने आध्यात्मिकता, बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, युवाओं की भूमिका, धर्म और राजनीति के संबंध, मंदिरों में व्यवस्था एवं वीआईपी दर्शन, गोवंश संरक्षण, धार्मिक आयोजनों तथा वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों सहित विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में गुंजन प्रजापति भी उपस्थित रहीं। इस दौरान रायपुर प्रेस क्लब के द्वारा संवाद हेतु हमर पहुना कार्यक्रम के आयोजन की सराहना की और विशेष सिलेब्रटियों के पत्रकारों से आत्मीय संवाद के इस तरह क्रम को देश में अनोखा और अनुकरणीय बतायापत्रकारों से चर्चा में आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि आज की परिस्थितियां मनुष्य को आध्यात्मिकता की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रही हैं। आध्यात्मिकता अब केवल धार्मिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि जीवन को संतुलित और सही दिशा देने की आवश्यकता बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि समय के साथ मनुष्य का प्रकृति और समाज से संबंध बदलता गया है। आज स्थिति यह है कि मानो मनुष्य के प्राण ही सोशल मीडिया में चले गए हैं।

इंटरनेट और सोशल मीडिया से दूर व्यक्ति स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस करने लगता है।उन्होंने कहा कि तकनीक जीवन को सुविधा देती है, लेकिन जब सुविधा निर्भरता में बदल जाती है तो मनुष्य के लिए चिंतन का विषय बन जाती है। आने वाले समय में तकनीक पर निर्भरता और बढ़ सकती है, इसलिए जरूरी है कि आधुनिकता के साथ आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों का संतुलन बना रहे।युवाओं की ऊर्जा समाज को रोशन करने में लगेGen-Z और युवाओं के आंदोलनों को लेकर आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि युवाओं के भीतर अपार ऊर्जा और शक्ति है।

उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि 440 वोल्ट की बिजली आ रही है तो उससे बल्ब जलाकर प्रकाश करें, किसी को छुआकर तड़पाएं नहीं। उनका कहना था कि शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में होना चाहिए।उन्होंने कहा कि युवाओं की आवाज बुलंद होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन किसी भी आंदोलन में धर्म, मंदिर या किसी व्यक्ति के प्रति आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। उन्होंने युवाओं से अपील की कि अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज और देश को रोशन करने के लिए करें, ऐसा कोई कार्य न करें जिससे किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचे या देश की छवि प्रभावित हो।राजनीति में धर्म हो, धर्म में राजनीति नहींधर्म और राजनीति के संबंध पर आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि “राजनीति में धर्म का प्रवेश होना चाहिए, लेकिन धर्म में राजनीति नहीं होनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि राजनीति बिना धर्म के नहीं चल सकती, लेकिन धर्म राजनीति के बिना भी चल सकता है।उन्होंने कहा कि राजनीति कई बार अपने हितों के लिए धर्म का प्रयोग करती है। इससे राजनीतिक उपलब्धि मिल सकती है, लेकिन तरीका उचित नहीं है। इसी तरह धार्मिक कथाओं और आयोजनों को राजनीतिक हितों से जोड़ने की कोशिश भी उचित नहीं है।

धर्म का उद्देश्य समाज को दिशा देना और मनुष्य के भीतर संस्कार एवं सद्भाव पैदा करना होना चाहिए।मंदिर केवल पूजा के नहीं, संस्कार और सेवा के केंद्रमंदिरों की व्यवस्था और वीआईपी दर्शन को लेकर उन्होंने कहा कि प्रत्येक मंदिर की अपनी व्यवस्था और नियम होते हैं। बड़े मंदिरों से बड़ी संख्या में परिवारों का भरण-पोषण भी होता है। मंदिरों में प्रसाद, सेवा, कर्मचारियों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं से जुड़ी व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रखना जरूरी है।

वीआईपी दर्शन के संबंध में उन्होंने तिरुपति बालाजी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी निर्धारित नियमों के अनुसार दर्शन की व्यवस्था है और कई बार विशेष लोगों को भी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उनका कहना था कि सामान्य श्रद्धालुओं की भावनाओं और सुविधा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, जिन लोगों की मौजूदगी से सुरक्षा या भगदड़ जैसी स्थिति पैदा होने की आशंका हो, उनके लिए अलग व्यवस्था की आवश्यकता हो सकती है।

उन्होंने कहा कि मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, बल्कि समाज और संस्कारों को मजबूत करने के केंद्र हैं। मंदिरों के संचालन में पारदर्शिता, नियम और जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।गोवंश संरक्षण पर गंभीर चिंतन की जरूरतगोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग के सवाल पर आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि “मां को मां घोषित करने के लिए अगर बालक ही लड़ रहे हैं, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।” उन्होंने कहा कि गाय भारतीय जीवन और कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है और गोवंश संरक्षण को लेकर समाज एवं सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

उन्होंने पारंपरिक कृषि व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले गोबर से खाद बनाकर खेती की जाती थी। आधुनिक रासायनिक खादों के बढ़ते इस्तेमाल और पारंपरिक व्यवस्थाओं से दूरी के प्रभावों पर भी विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोवंश की संख्या और संरक्षण को लेकर संत समाज एवं धार्मिक संगठन लंबे समय से चिंता व्यक्त करते रहे हैं। इस विषय पर समाज में गंभीर विमर्श और ठोस प्रयास आवश्यक हैं।गरबा और धार्मिक आयोजनों में व्यवस्था को विवाद का विषय न बनाएंनवरात्रि के दौरान गरबा आयोजनों में प्रवेश को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि गरबा नाइट्स होनी चाहिए और युवाओं को ऐसे आयोजनों में भाग लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी आयोजन में आयोजकों द्वारा सुरक्षा और व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नियम बनाए जा सकते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार स्कूल में विद्यार्थियों और पत्रकार वार्ता में पत्रकारों के लिए व्यवस्था होती है, उसी प्रकार अलग-अलग स्थानों की अपनी व्यवस्थाएं होती हैं। इसे अनावश्यक विवाद का विषय बनाने के बजाय व्यवस्था के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।चमत्कार और प्राकृतिक घटनाओं पर बोले इन्द्रेश महाराजधर्मगुरुओं के चमत्कारों और भविष्य की घटनाओं की जानकारी पहले से देने के सवाल पर आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि यदि हर प्राकृतिक घटना की भविष्यवाणी की अपेक्षा की जाए तो भगवान और प्रकृति के अस्तित्व पर भी प्रश्न खड़े होंगे।

उन्होंने कहा कि प्रकृति अपना कार्य करती है और संसार में परिवर्तन निरंतर होता रहता है।भूकंप, बारिश, युद्ध और अन्य घटनाओं को लेकर उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल बाहरी घटनाओं पर सवाल उठाने के बजाय प्रकृति और जीवन के व्यापक स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आस्था का आधार केवल चमत्कार नहीं, बल्कि विश्वास, संयम और आध्यात्मिक चिंतन भी है।

चुनाव और आरोपों पर आध्यात्मिक दृष्टिकोणमतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर आचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि जब दो पक्ष होते हैं तो विवाद होना स्वाभाविक है। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि कौरवों के पास बड़ी सेना थी, लेकिन पांडवों के साथ भगवान कृष्ण थे और अंततः पांडव विजयी हुए।उन्होंने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियों में हारने वाला पक्ष कई बार अलग-अलग सवाल उठाता है। कभी वोटिंग मशीन, कभी बूथ और कभी चुनावी प्रक्रिया को लेकर आरोप लगाए जाते हैं। उन्होंने इस पूरे विषय को आध्यात्मिक दृष्टि से देखने की बात कही और कहा कि अंतिम रूप से प्रकृति और समय अपना निर्णय करते हैं।गृहस्थ जीवन के लिए भक्ति और आध्यात्मिकता आधारआचार्य इन्द्रेश महाराज ने कहा कि भक्ति केवल साधु-संतों या आश्रमों तक सीमित नहीं है। गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए भी भक्ति और आध्यात्मिकता जीवन का आधार बन सकती है। आध्यात्मिकता व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती है, उसे संयम सिखाती है और कठिन परिस्थितियों में सही रास्ता चुनने की शक्ति देती है।उन्होंने कहा कि आज मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, लेकिन मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ी है। ऐसे समय में परिवार, समाज, प्रकृति और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ना आवश्यक है।

प्रेस क्लब की पहल की सराहना‘हमर पहुना’ कार्यक्रम के दौरान आचार्य इन्द्रेश महाराज ने पत्रकारों से खुले और आत्मीय संवाद के लिए रायपुर प्रेस क्लब की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि पत्रकार समाज के विभिन्न वर्गों और विचारों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ऐसे संवाद समाज को केवल सूचना ही नहीं देते, बल्कि विचार और चिंतन के लिए भी प्रेरित करते हैं।कार्यक्रम में रायपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष मोहन तिवारी, महासचिव गौरव शर्मा, उपाध्यक्ष दिलीप साहू, कोषाध्यक्ष दिनेश यदु, संयुक्त सचिव निवेदिता साहू एवं भूपेश जांगड़े उपस्थित रहे पत्रकारों ने आचार्य इन्द्रेश महाराज से विभिन्न समसामयिक और आध्यात्मिक विषयों पर सवाल पूछे, जिनका उन्होंने सहज एवं विस्तारपूर्वक उत्तर दिया।

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